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अपनी मां के स्तनों को देख कर पुरुषों में कामवासना क्यों जाग्रत नहीं होती है ?

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अपनी मां के स्तनों को देख कर पुरुषों  में कामवासना क्यों  जाग्रत  नहीं होती है ?  मैंने तो शादी की रस्म में भी देखा है  कि बारात के जाते समय दुल्हा अपने माँ के स्तनों से दूध पीने की रस्म करता है। मेरी दादी तो  70 की उम्र में पापा के सामने नहा भी लिया करती थी। कभी - कभी पापा खुद उन्हें अच्छे से नेहा दिया करते थे। ऐसा ही मेरी ताई जी के साथ वो बिना ब्रा के रहती है  कोई उन्हें कुछ नहीं बोलता ।  शायद बढ़ती उम्र में औरतों की यौनिकता के कम होने के कारण उन्हें आजादी मिल जाती है। बहु से सास बनते  - बनते  औरतों का पर्दा हटने के साथ ज़्यादातर पाबंदियां खत्म हो  जाती है   साथ ही उनकी युवा अवस्था  भी समाप्त हो जाती है।  जबकि पुरुष समाज  सबसे ज्यादा  ध्यान महिला के स्तनों को ढकने  की ओर देता है। जैसे स्तन नहीं हो गए । कोई बम हो गए । जो पुरूष के देखने भर से वो लालायित हो उठेगा।मानो उसके शरीर के बाकी हिस्सों की तरह ये खास है ये खास नहीं है इसे खास बनाया गया है उनके स्तनों को उनकी इज्जत , शर्म में परिवर्त...

लज्जा ( तस्लीमा नसरीन) बुक रिव्यू

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लज्जा बुक रिव्यू (तस्लीमा नसरीन)  पुस्तक प्रासंगिकता -  लज्जा तसलीमा नसरीन द्वारा रचित एक बंगला उपन्यास है। यह उपन्यास पहली बार 1993 में प्रकाशित हुआ था यह पाँचवाँ उपन्यास सांप्रदायिक उन्माद के नृशंस रूप को रेखांकित करता है। कट्टरपन्थी मुसलमानों के विरोध के कारण बांग्लादेश में लगभग छः महीने के बाद ही इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इस अवधि में इसकी लगभग पचास हजार प्रतियाँ बिक चुकी थी। धार्मिक कट्टरपन को उसकी पूरी बर्बरता से सामने लाने के कारण उन्हें इस्लाम की छवी को नुकसान पहुँचाने वाला बताकर उनके खिलाफ मौलवियों द्वारा सज़ा-ए-मौत के फतवे जारी किए गए। बाँग्लादेश की सरकार ने भी उन्हें देश निकाला दे दिया। जिसके बाद उन्हें भारत तथा अन्य देशों में शरणार्थी बनकर रहना पड़ा। शीर्षक – लज्जा का अर्थ कई मायनों में अलग – अलग है जिसे भारतीय समाज में  शर्म, लाज, हया, शर्मिदगी इत्यादि के नाम से जाना जाता है। लेकिन इन शब्दों को अलग – अलग परिस्थितियों में बोला जाता है, उसी प्रकार तसलीमा नसरीन ने लज्जा शब्द का प्रयोग बंग्लादेश के दंगों में हिन्दूओं पर हो रहे अत्याचारों व महिलाओं के साथ हो रह...

स्त्री के अस्तित्व की कहानी

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कौन हूँ मैं ? क्या हूँ मैं ? कहां हूँ मैं ?  जल्दी आऊ तो मुसीबत देर से आऊ तो भी मुसीबत  ना आऊ तो सवाल  हर -पल डर लगता है मुझसे  मैं कहीं भी, कभी भी आ जाती हूँ  मेरा ना आना भी डरा देता है  आना भी दर्द देता है।  मेरे आने से  पहले ही तैयार रखना पड़ता है उन्हें खुद को  आऊ तो बंदिशें उसपर मंदिर मत जाओ तुलसी को मत छुओ आचार को मत छुओ रसोई में मत जाओ हर जगह रोक दिया जाता है उसे क्या अस्तित्व है मेरा ? कहने को तो लोग मुझे  गंदा होना, रजोधर्म,  मासिक, पीरियड के नाम से पुकारते हैं।  हां, होती है कमजोर, वह इन दिनों में  फिर भी वह दुर्गा, काली का रूप धारण किए लगी रहती है घर के कामों में  क्यों भगवान का वरदान अभिशाप बन गया स्त्री के लिए  मेरे आने से टूटता है शरीर जैसे टूटती है शरीर की हड्डियां  दर्द होता है पेट में, जैसे आधा हो गया हो शरीर होता है पीठ दर्द, जैसे वर्षों का हो दर्द शरीर से निकलती है रक्त की बूदें, जैसे बह रहा हो पानी कही मैं किसी को दिख ना जाऊ  हर तरह से छिपाया जाता है मुझे अगर दिख भी जाऊ गल...

क्योंकि मैं चुप हूँ

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मैं चुप हूँ  क्योंकि  मुझे चुप रहना सिखाया गया है  मैं चुप हूँ  क्योंकि  मुझे इज्जत बचानी सिखाई  गई है।  मैं चुप हूँ  क्योंकि मुझे  अपनी सीमा में रहना सिखाया गया है  मैं चुप हूँ  क्योंकि मुझे रिश्तें निभाने सिखाए गए हैं। मैं चुप हूँ क्योंकि मुझे सहना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ  क्योंकि मेरे जिस्म को ही  मेरी आबरू बनाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि  मुझे कमजोर ,बेसहारा , नाजुक , भोली -भाली व बेचारी  बताया  गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि मुझे  पुरूष के अस्तित्व में रहना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि   मुझे  पुरूष से डरना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि  मुझे आज्ञा का पालन करना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि  मुझे रोना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि  मुझे झुकना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि मुझे  एक अच्छी लड़की बनना सिखाया गया है।  मैं चुप हूँ क्योंकि मुझे   दान किया जाता है।  मैं चुप हूँ ...

प्रेम में

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प्रेम में  क्या गुलाबों की तरह  काटों पर चलोगें क्या ?  जात, धर्म , समाज छोड़ कर  इंसान बनोगे क्या ? कामवाली ना समझकर  साथी बनाओगे क्या ?  घर की रानी ना बनाकर , दिल की महारानी बनाओगे क्या ?  जिस्म से प्यार ना करके   रूह से प्यार करोगे क्या ?  बड़ी- बड़ी बातें ना करके  सच्च बोलकर  दिल जीतोगे क्या ?  दूर होकर भी  साथ रहोगे क्या ?   दिल टूटने पर भी  मनाओगे  क्या ?  जिम्मेदारी न समझकर   इबादत करोगे क्या ?  गलती करने पर  ताने मारने के बजाय  सुधारोगे क्या ?  दिल से ,प्यार खत्म होने पर   बेहिचक बताओगे क्या ।   घर की इज्जत ना मानकर  इंसान समझोगे क्या ?  फड़फड़ाते परों को ना कुचलकर  उड़ना सिखाओगे क्या ?   सिर्फ मेरे ही  मेरे रहोगे क्या ?   प्रिया गोस्वामी 

मेरी कविता

 मेरा अस्तित्व  मेरी आवाज  मेरे शब्द  मेरी पीड़ा  मेरे अहसास  मेरी करूणा  ( गाय, सीता , सुंदर सुशील ,सीधी सादी,  बेचारी , मूंग  लड़कियां बोलने लगी है।)   कभी पढ़ो तो हमें 

ज्ञान क्या है सोनाक्षी सिन्हा कितनी सही कितनी गलत

बेरोजगार लोगों की कहानी ज्ञान क्या है इसे समझें पहले किसी विषय में गहण ज्ञान रखने  वाले को ज्ञानी बताया जाता है हर व्यक्ति  हर विषय में ज्ञानी नहीं हो सकता । अगर ऐसा होता तो सभी प्रकार के व्यक्ति  हर क्षेत्र में पाए जाते उन्हें सालों पढ़ाई करने व रिसर्च करने की आवश्यकता नहीं पढ़ती। हर व्यक्ति  की समझ एक ही विषय पर एक  जैसी होती , क्योंकि उन्हें तो हर विषय का ज्ञान है लेकिन किसी एक विषय पर  गहण  ज्ञान नहीं है।  अगर हर कोई हर विषय पर लिख - बोल लेता तो किसी भी विशेष रिपोर्ट का महत्व ना होता , ना ही उस विशेष व्यक्ति  की किसी भी विषय पर कही गयी बातों का  महत्व होता । महत्व तब होता है जब वो व्यक्ति उस विषय का जानकार हो हमारे देश को किसी अर्थशास्त्री  की जरूरत नहीं होती । ना ही विदेशी सलाहकार की । तो फिर फेसबुक पर भी सभी हर विषय पर लिख बोल रहे होते  । हर कोई कविता , शायरियां, कहानियां,तथा राजनीति , समाजिक , आर्थिक विषयों पर लिख रहा होता । लेकिन ऐसा नहीं है  हर व्यक्ति की पहचान उसकी किसी  विषय विशेष  में र...